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प्रस्तुत पुस्तक में भगवान बुद्ध के संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, सिद्धांतों और आदशों का वर्णन सरल भाषा में किया गया है।

आड़ू के फूलों की गंध..., नीबू की पत्तियों की गंध,...कालिका मंदिर के पिछवाड़े नारंगी की गंध, लकड़ियों के पूले बाँधते हुए, चिरे हुए रामबाँस की गंध,.

सत्तरादि के आरंभ में हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया?

'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

बाकी सब तो कविताएँ ही अपने ढंग से कहेंगी: उनके बारे में कवि को संभव हो तो चुप ही रहना चाहिए। अकसर कविताएँ कवि से अधिक जानती हैं; अपने रचयिता से। इतना भर इस मुकाम पर कहा जा सकता है कि ज्यादातर एक ऐसे समय और समाज में जो कविता से कोई उम्मीद नहीं लगाता और अकसर उसकी अनसुनी-अनदेखी ही करता है, कविता में विश्वास बना रहा है।

प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।

हालाँकि कवियों ने सदियों से ग्रंथों से सागर का वर्णन किया है, पर इस पुस्तक में सागर के विभिन्न रूपों का रोचक व उपयोगी वृत्तांत है ।

‘पेड़ खाली नहीं more info है’ नरेन्द्र नागदेव की विगत आठ-दस वर्षों में प्रकाशित-चर्चित कहानियों का संग्रह है, जिसमें वे तमाम विशेषताएं विद्यमान हैं, जो उन्हें समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं।

प्राय: जनता नेताविहीन थी, लेकिन उसके अंत:करण में 'करो या मरो' का मंत्र अनुगूँज रहा था । वह उससे अनुप्रेरित होकर दुर्द्धर्ष संघर्ष कर रही थी । उसने अनेक स्थानों की बागडोर स्वयं संभाल लो थी । यथार्थतः तब देश जनक्रांति के दौर से गुजर रहा था। 

प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-

'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के जिन स्तम्भों को हिन्दी पाठक का अपूर्व स्नेह और लोकप्रियता मिली, उनमें 'इस बार' का विशेष महत्त्व रहा है । 'चेहरे और चेहरे' रामकुमार भ्रमर द्वारा विभिन्न क्षेनों में समय-समय पर बहुचर्चित रहे व्यक्तियों के उन्हीं चरित्र-व्यंग्यों का संकलन है, जो उन्होंने 'इस बार' के अन्तर्गत लिखे थे । सुप्रसिद्ध कार्दूनिस्ट रंगा द्वारा इन चरित्रों के जो कार्टून उन लेखों के साथ बनाये गए थे, उन्हें भी प्रस्तुत पुस्तक में सहेजा गया है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के इन व्यक्तियों को लेकर लेखक ने समय-समय पर जो कुछ लिखा, वह बहुत पसंद किया गया । इन चरित्रों को लेकर भ्रमर के व्यंग्यपूर्ण लेखन की गुदगुदी पाठक का मन लुभा लेती है और अनायास ही चेहरे और चेहरे की मुस्कान बन जाती है ।

फिल्म ‘दूरियां’ के लिए ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ प्राप्त

मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।

यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।

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