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हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक संपन्न अग्रवाल परिवार में हुआ। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे, जो गिरधरदास उपनाम से लेखन कार्य करते थे। गिरधरदास नाम से लिखित ‘नहुष’ नाटक को हिंदी का प्रथम नाटक कहा जाता है। नहुष नाटक को ही पढ़कर हरिश्चन्द्र में नाटककार बनने की इच्छा जागृत हुई और हरिश्चन्द्र हिंदी रंगमंच के संस्थापक के रूप में स्थापित हो गए।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

अहिंसा के पुजारी गौतम बुद्ध ने हिंसा का डटकर विरोध किया । वे अहिंसा को महान धर्म मानते थे । बाल्यावस्था से ही वे हिंसा के विरोधी थे । किसी भी प्रकार की हिंसा पर वे अपने मित्रों को समझाते थे कि हिसा महान् पाप है । इससे आत्मा को बहुत क्लेश होता है ।

किसी भी सामाजिक समस्या के हल के लिए उपयोगी साहित्य को आवश्यकता होती है । ऐसा साहित्य समस्या के प्रति जनचेतना तो जगाता ही है, समाज को इसके हल के नजदीक ले जाने में भी सहायक होता है । पुस्तक में विकलांग विभूतियों के व्यक्तित्व की विवेचना के अलावा विकलांगता का इतिहास, विकलांगता के बारे में समय-समय पर बदलती धारणा, विकलांग विभूतियों की सफलता का राज भी वर्णित है ।

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सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 

संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास website ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।

यदि आपके पास धन की कमी हो या धन की समस्या से झूझ रहे हों तो आप कपूर का इस्तेमाल करें।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।

जमींदार के खेत में हल जोतते बेलाराम को पेड़ पर हार मिला । जमींदार ने कहा-“मेरा खेत, मेरा पेड़, अत: हार भी मेरा ।" बेलाराम ने अपनी बात कही तो जमींदार ने अपने कान पकड़ लिए । बोला- "माफ कर दो बेलाराम ।" [घोसले में हार]

देवपति को कम सुनता था। यह लड़की तुतलाकर बोलती थी। दोनों मिले तो शादी को राजी हो गए। फिर उनकी मुलाकात हुई एक मेंढक से । [मिठाई दो]

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।

ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।

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